'मानवता की सबसे बड़ी खोज': वो अंतरिक्ष यान जिसने सौर मंडल को देखने का हमारा नज़रिया बदल दिया

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'मानवता की सबसे बड़ी खोज': वो अंतरिक्ष यान जिसने सौर मंडल को देखने का हमारा नज़रिया बदल दिया

लॉन्च होने के लगभग 50 साल बाद यह अंतरिक्ष यान हमसे एक प्रकाश-दिवस की दूरी पर पहुँचने वाला है और अभी भी क़ीमती डेटा वापस भेज रहा है.

नासा द्वारा 1977 में छोड़े गए जुड़वा प्रोब्स में से एक, वॉयेजर 1, इस साल नवंबर में पृथ्वी से एक लाइट-डे की दूरी पर पहुँच जाएगा. यानी वह दूरी जो प्रकाश एक दिन में तय करता है - लगभग 26 अरब किलोमीटर.

वॉयेजर 1 पहले ही किसी भी मानव-निर्मित वस्तु से ज़्यादा दूर जा चुका है. लेकिन उससे भी ज़्यादा उल्लेखनीय बात यह है कि नासा अब भी इस प्रोब से ख़बरें सुन रहा है.

पाँच साल तक चलने के लिए बनाए गए वॉयेजर 1 और 2 लगभग 50 साल बाद भी अंतरिक्ष में काम कर रहे हैं, और खगोलविदों को ब्रह्मांड के बारे में अनमोल जानकारी दे रहे हैं.

यह सब उस तकनीक पर चल रहा है जो आज के समय में बेहद पुरानी लगती है.

मिशन की मौजूदा प्रोजेक्ट साइंटिस्ट डॉक्टर लिंडा स्पिलकर ने बीबीसी को बताया, "आपकी कार खोलने वाले की-फ़ॉब में जितनी मेमोरी होती है, उतनी ही वॉयेजर के कंप्यूटरों में है."

वॉयेजर मिशन इंसानों के सौर मंडल की खोज में आगे बढ़ते कदमों का नतीजा था.

लॉन्च से पंद्रह साल पहले ही नासा ने 1962 में मैरिनर 2 के ज़रिए शुक्र ग्रह तक पहली सफल यात्रा पूरी कर ली थी.

तीन साल बाद, मैरिनर 4 मंगल के पास से गुज़रा और पृथ्वी से बाहर किसी ग्रह की पहली नज़दीकी तस्वीरें लीं.

बाहरी चार विशाल ग्रहों - बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून - तक पहुँचने की योजना तब बनी जब अमेरिकी एयरोस्पेस इंजीनियर गैरी फ़्लैंड्रो ने 1970 के दशक के अंत में उनकी दुर्लभ स्थिति का अनुमान लगाया.

इससे एक संभावित अंतरिक्ष यान को उन्हें ज़्यादा आसानी से देखने का मौका मिल सकता था - वैज्ञानिकों ने इसे ग्रैंड टूर या महायात्रा कहा.

उस समय इस क्षेत्र के बारे में हमारी जानकारी बहुत बुनियादी थी.

अंतरिक्ष इतिहासकार और लेखिका एमी शिरा टाइटल कहती हैं, "प्राचीन यूनानी बृहस्पति और शनि के बारे में जानते थे… लेकिन वे बस रोशनी के धब्बे थे."

वह कहती हैं, लेकिन वॉयेजर मिशन के साथ, "अचानक हम धुंधले-से ग्रहों की अवधारणा से निकलकर हर क्लासरूम में परिचित ग्राफ़िक्स तक पहुँच गए."

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

नासा का बाहरी ग्रहों तक पहला मिशन पायनियर 10 था, जिसने 1973 में बृहस्पति के पास से उड़ान भरी. इसने साबित कर दिया कि मंगल और बृहस्पति के बीच स्थित क्षुद्रग्रह बेल्ट को सफलतापूर्वक पार करना और लाखों किलोमीटर दूर से पृथ्वी से संवाद करना संभव है. इसकी बहन प्रोब पायनियर 11 ने छह साल बाद शनि के पास से उड़ान भरी.

1969 में अमेरिका ने सोवियत संघ से आगे निकलकर चाँद पर उतरने में सफलता पाई थी. इसके बाद नासा को भविष्य के मिशनों के लिए राजनीतिक समर्थन और फंडिंग में गिरावट का सामना करना पड़ा.

वॉयेजर के ग्रैंड टूर की मूल योजनाओं को बदलकर सिर्फ़ दो बाहरी ग्रहों की यात्रा तक सीमित करना पड़ा.

हालांकि पर्दे के पीछे वैज्ञानिक चुपचाप वॉयेजर्स को और आगे जाने के लिए तैयार कर रहे थे.

डॉक्टर एलन कमिंग्स, अब भी वॉयेजर मिशन पर काम कर रहे एक खगोल भौतिकविद हैं. वह स्वीकार करते हैं कि "आधिकारिक तौर पर हम बृहस्पति और शनि तक पाँच साल के मिशन के ल

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