क्यों मुश्किल है अखिलेश की पार्टी में ममता और उद्धव की पार्टी जैसी टूट?

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उत्तर प्रदेश की सियासत में दो दिनों से सत्तापक्ष की तरफ से ओम प्रकाश राजभर और केशव प्रसाद मौर्य सपा में टूट का दावा कर रहे हैं, लेकिन ममता बनर्जी की टीएमसी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) से काफी अलग सीन समाजवादी पार्टी का है. इसीलिए सपा में बगावत आसान नहीं है?

ममता बनर्जी की टीएमसी में बगावत और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में टूट के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी को लेकर नए सियासी दावे किए जा रहे हैं. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य दोनों कह रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के कई सांसद और नेता पार्टी छोड़ सकते हैं.

ओमप्रकाश राजभर और केशव मौर्य के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या समाजवादी पार्टी में भी वैसी ही टूट संभव है जैसी महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) और पश्चिम बंगाल में टीएमसी के सांसदों ने अपना अलग गुट बना लिया है.

हालांकि, मौजूदा राजनीतिक हालात और संसदीय गणित को देखें तो समाजवादी पार्टी में लोकसभा सांसदों की बड़ी टूट की संभावना बेहद कठिन नजर आती है. यही वजह है कि राजभर के दावे की हवा सपा के दो सांसदों ने निकाल दी है.

राजभर और केशव मौर्य का दावा उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बुधवार को कहा कि बहुत जल्द सपा में भी टूट होने जा रही है. सपा के महासचिव रामगोपाल यादव ने अमित शाह को एक चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने उन सांसदों का नाम भी दिया है, जो भाजपा में शामिल होंगे. इतना ही नहीं गुरुवार को दोबारा से राजभर ने कहा कि सपा के बागियों का नेतृत्व 'बागी बलिया' का लाल करेगा. इस तरह से उनका इशारा सपा सांसद सनातन पांडेय के ऊपर था.

डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने दावा किया है कि सपा के 25-26 सांसद अभी टूटने को तैयार हैं, लेकिन हम तोड़ नहीं रहे हैं. हमें पता है कि 2027 चुनाव के बाद वो खुद ही टूटकर चले जाएंगे. उन्होंने कहा कि सपा का संचालन, अखिलेश की साइकिल नहीं कर सकती है. वो साइकिल सैफई जा सकती है सत्ता के गलियारे में नहीं चल सकती है. इस तरह राजभर के बाद केशव मौर्य ने साफ कह दिया है कि सपा के सांसद बीजेपी के संपर्क में है.

सपा में टूट क्यों आसान नहीं है अखिलेश यादव को भले ही सियासत विरासत में मिली है, लेकिन 2024 में पार्टी को कमबैक कराकर अपना लोहा मनवा लिया. लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. यह जीत केवल सपा के संगठनात्मक नहीं थी, बल्कि अखिलेश यादव के नेतृत्व की भी बड़ी राजनीतिक स्वीकृति मानी गई.

सपा के अधिकांश सांसद पहली बार जीतकर संसद पहुंचे हैं और उनकी राजनीतिक पहचान सीधे अखिलेश यादव और सपा के चुनावी प्रतीक से जुड़ी हुई है. यही वजह है कि सांसदों के बड़े समूह के एक साथ अलग होने की संभावना सीमित दिखाई देती है.

भारत के दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी भी संसदीय दल में वैध विभाजन के लिए कम से कम दो-तिहाई सांसदों का साथ होना जरूरी है. सपा के 37 लोकसभा सांसदों के मामले में इसका मतलब है कि लगभग 25 सांसदों को एक साथ अलग होना पड़ेगा. सपा में इतना बड़ी संख्या में सांसदों को बागवत की राह पर ले जाना बेहद मुश्किल माना जा रहा है.

सपा के 37 सांसद हैं, उसमें पांच सपा अखिलेश यादव के परिवार से हैं. अखिलेश और उनकी पत्नि डिंपल यादव सांसद हैं. इसके अलावा धर्

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