ईरान अमेरिका के साथ हुए समझौते को अपनी जीत क्यों मान रहा है?
अमेरिका और ईरान के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर हो गए हैं. पर ईरान में इस समझौते को लेकर दुविधा देखी जा रही है.
अमेरिका के साथ मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) को ईरान का नेतृत्व, पीछे हटने के बजाय प्रतिरोध और जीत का नतीजा बताने की कोशिश कर रहा है. लेकिन लोगों को दलील से सहमत करवाना आसान नहीं है.
देश अभी-अभी एक विनाशकारी युद्ध से गुज़रा है, अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव है और ईरान के अपने समर्थकों का एक हिस्सा महीनों से वॉशिंगटन के साथ किसी भी समझौते का विरोध करता रहा है.
इसके अलावा ईरान के भीतर और बाहर भी ऐसे लोग हैं जो इस संकट को कूटनीति का अवसर नहीं, बल्कि शासन परिवर्तन का मौका मानते हैं.
इसी राजनीतिक विरोधाभास की ज़मीन पर ईरान अब इस समझौते को जीत के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है.
वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों ने इस समझौते को जीत बताया. संसद अध्यक्ष और वार्ता में अहम भूमिका निभाने वाले मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने कहा कि ईरान ने 'अंतिम जीत की ओर एक लंबा क़दम बढ़ाया है'.
राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने एक बड़े परिवर्तन की संभावना के रूप में इस समझौते की व्याख्या की.
उन्होंने कहा कि अगर इसे पूरी तरह लागू किया गया तो यह ईरान की कई समस्याएँ हल कर सकता है और ईरान व मध्य पूर्व में 'एक अलग दुनिया' बना सकता है.
ग़ालिबाफ़ की भूमिका अहम है क्योंकि उन्हें पेज़ेश्कियान के उदारवादी खेमे से नहीं माना जाता.
उनका सार्वजनिक समर्थन यह दिखाता है कि इस समझौते को इस्लामी गणराज्य की अधिक ताक़तवर संस्थाओं, यहाँ तक कि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के भीतर भी समर्थन हासिल है.
बुधवार को ईरान और अमेरिका के बीच एमओयू पर इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर किए गए.
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
ईरान का नेतृत्व इस समझौते को जीत के रूप में इसलिए भी पेश कर रहा है क्योंकि ईरान के तर्क के अनुसार, अमेरिका और इसराइल अपने मुख्य उद्देश्यों को हासिल करने में नाकाम रहे.
वे ईरान को आत्मसमर्पण कराने में असफल रहे, इस्लामी गणराज्य को सत्ता से हटाने में नाकाम रहे, सैन्य कार्रवाई से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को ख़त्म नहीं कर पाए और हिज़्बुल्लाह से ईरान के रिश्ते नहीं तोड़ पाए.
इसके बजाय, ईरान अब भी वार्ता की मेज़ पर है, लेबनान को शांति समझौते के दायरे में शामिल किया गया है और प्रतिबंधों में राहत पर चर्चा हो रही है.
संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के उपाध्यक्ष और कट्टरपंथी सांसद ने मसौदा समझौते को ऐसा दस्तावेज़ बताया है जो ईरान को अमेरिका का उपनिवेश बना देगा.
उन्होंने वार्ताकारों पर यह आरोप भी लगाया कि उन्होंने सर्वोच्च नेता के उस निर्देश की अनदेखी की, जिसमें कहा गया था कि होर्मुज़ स्ट्रेट को शिपिंग के लिए दोबारा न खोला जाए.
यह आलोचना इसलिए अहम है क्योंकि यह व्यवस्था के बाहर से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की निगरानी करने वाली संस्था के भीतर से आई है.
कई महीनों से संसद में कट्टरपंथियों, सरकार-समर्थित मीडिया और सरकार-समर्थक सभाओं में यह तर्क दिया जाता रहा है कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
वे इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि युद्ध शुरू होने से ठीक पहले भी कूटनीति जारी थी और कहते
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