6 बार टूट चुकी है शिवसेना, उद्धव के कार्यकाल में ही 4 बार बगावत
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का सियासी संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. चार साल में दूसरी बार उद्धव ठाकरे को बगावत का सामना करना पड़ा है. 2022 में एकनाथ शिंदे ने पार्टी ही छीन ली और अब 6 लोकसभा सांसद अलग राह पर चल पड़े हैं. इस तरह उद्धव की पार्टी टूट गई है.
महाराष्ट्र की सियासत में मराठी अस्मिता के नाम पर 1966 में बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना का गठन किया. शिवसेना अपने सियासी इतिहास में छह बार टूट चुकी है और एक बार फिर उद्धव ठाकरे के 9 में से 6 लोकसभा सांसद अलग होकर एकनाथ शिंदे से हाथ मिला लिया है. इस तरह बालासाहेब ठाकरे के सियासी विरासत संभाल रहे उद्धव ठाकरे के कार्यकाल में चार बार पार्टी में बगावत हो चुकी है.
शिवेसना (यूबीटी) चार साल में दूसरी बार टूटी है. शिवसेना लगभग हर दशक में टूटती और बिखरती रही है. शिवसेना से निकलकर छगन भुजबल से लेकर नारायण राणे और राज ठाकरे ने अपनी अलग पार्टी बनाई तो एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे से शिवसेना ही छीन ली.
एकनाथ शिंदे के बगावत के बाद उद्धव ठाकरे ने किसी तरह से शिवसेना (यूबीटी) बनाया, लेकिन चार साल के बाद अब उनके 9 में से 6 लोकसभा सांसद अलग हो गए. ये उद्धव ठाकरे की सियासत के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि शिवसेना में कब-कब बगावत का सामना करना पड़ा है?
शिवसेना गठन के कुछ साल बाद बगावत बालासाहेब ठाकरे ने साठ के दशक में शिवसेना की बनियाद रखी. 19 जून 1966 को बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना के राजनीतिक दल के रूप में गठन किया. शिवसेना के बने कुछ ही दिन हुए थे कि शिवसेना के दिवंगत संस्थापक बाल ठाकरे और मुंबई के एक नेता बंदू शिंगरे के बीच तनाव हो गया.साल 1974 में मुंबई में लोकसभा उपचुनाव होना था. इस चुनाव में बाल ठाकरे ने कांग्रेस के उम्मीदवार रामराव आदिक को समर्थन देने का फैसला किया.
बंधु शिंगरे शिवसेना के कद्दावर नेता थे और मुंबई के परेल-लालबाग मिल मजदूर इलाके में उनकी पकड़ थी. वे बाल ठाकरे के कांग्रेस को समर्थन देने के इस फैसले के सख्त खिलाफ थे. इसी चलते ही उन्होंने पार्टी छोड़ दी. शिवसेना से बाहर निकलने के बाद बंधु शिंगरे ने शिवसेना के समानांतर एक नया संगठन खड़ा किया.उन्होंने अपनी इस नई पार्टी का नाम 'प्रति शिवसेना'रखा. हालांकि, उनकी पार्टी कोई खास असर नहीं छोड़ सकी.
शिवसेना में दूसरी बगावत छगन भुजबल ने की शिवसेना के गठन के बाद से यह पार्टी अपने आक्रामक हिंदुत्व और क्षेत्रीय अस्मिता के लिए जानी जाती रही है, लेकिन इसके साथ ही पार्टी के भीतर आंतरिक कलह और बड़े नेताओं का बाहर निकलना एक ऐतिहासिक सच्चाई रही है. 1991 में छगन भुजबल का बगावत करना शिवसेना के लिए पहला बड़ा झटका था, जिसने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को चुनौती दी.
शिवसेना के 52 विधायक जीतकर आए थे. छगन भुजबल चाहते थे कि पार्टी उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए. बालासाहेब ठाकरे ने भुजबल की जगह पर मनोहर जोशी को बना दिया, जिसके चलते भुजबल नाराज हो गए.
भुजबल ने 17 शिवसेना विधायकों के साथ बगावत कर दी. पहली बार किसी बहुत बड़े कद के नेता ने पार्टी में विरोध के सुर उठाए थे. तब महज कई विधायकों ने कथित तौर पर विधानसभा स्पीकर को समर्थन पत्र सौंपा था और दूसरे गुट को शिवसेना बी माना गया था. भुजबल ने 17 विधायकों के साथ पार्टी छोड़कर वे शरद पवार के नेतृत्व में कांग्रेस में शामिल हो गए.
नारायण राणे ने बगावत कर बन
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