भरत तिवारी कौन थे जिनके 'एनकाउंटर' पर उठ रहे हैं सवाल, अब तक क्या-क्या हुआ?

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भरत तिवारी कौन थे जिनके 'एनकाउंटर' पर उठ रहे हैं सवाल, अब तक क्या-क्या हुआ?

भरत तिवारी की सामाजिक पहचान और फ़ेसबुक फॉलोइंग उन्हें ऐसे युवा के रूप में दिखाती है जो स्थानीय मुद्दे उठा रहे थे.

बिहार के भोजपुर ज़िले के भरत भूषण तिवारी के 'एनकाउंटर' का मामला लगातार सुर्ख़ियों में है.

भरत तिवारी के फ़ेसबुक लाइव, सरेंडर के दावे और न्यायिक जांच के आदेश ने इस घटना को 'फ़र्ज़ी एनकाउंटर' से 'एनकाउंटर राज' की बहस तक पहुंचा दिया है.

ऐसे में ये सवाल उठता है कि आख़िर कौन थे भरत भूषण तिवारी, जिनके 'एनकाउंटर' ने राजनीतिक और क़ानूनी तौर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

शाहपुर के जवइनियां गाँव में हमारी कोशिश इस सवाल के तह तक पहुंचने की थी.

गाँव के मुहाने पर भरत तिवारी की तस्वीर के साथ एक बड़ा बोर्ड लगाया गया है. जिस पर लिखा है- 'शहीद भरत नगर जवइनियां, आपका बलिदान सदैव स्मरणीय रहेगा.'

यहां के ग्रामीण कहते हैं कि यह नाम भरत तिवारी की श्रद्धांजलि में लोगों ने रखा है.

ये वही गाँव है जहाँ बीती 17 जून को पुलिस ने भरत तिवारी का 'एनकाउंटर' किया, जिसके बाद इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.

हालांकि भोजपुर के एसपी की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ के अनुसार, "पुलिस टीम ने ख़ुद और लोगों की सुरक्षा के लिए गोली चलाई थी, जो भरत भूषण के पाँव में लगी."

इन गांव वालों का कहना है कि अगर भरत तिवारी ने इस गांव के लिए आवाज़ नहीं उठाई होती तो शायद पुनर्वास, बिजली और पानी के मुद्दे भी सामने नहीं आते.

कई गांव वाले हमसे बातचीत में दावा करते हैं, "भरत ने हमारी मांग के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी."

जवइनियां से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर बिलौटी गाँव में आरा-बक्सर राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक सरकारी स्कूल है. इसके सामने भरत का निर्माणाधीन एक मंज़िला मकान है.

यहां उनके माता-पिता से मिलने लगभग हज़ारों की संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, ग्रामीण, मीडियाकर्मी और विभिन्न दलों के नेताओं के आने का सिलसिला लगातार जारी है.

घर के बरामदे में भरत के 70 वर्षीय पिता काशीनाथ तिवारी भीड़ से घिरे रहने के बावजूद बेटे की मौत के सदमे से बेसुध दिखते हैं.

वहीं, भरत की मां 57 वर्षीय आशा देवी घर के एक कमरे में गाँव और रिश्तेदारी की महिलाओं के बीच रोते हुए एक ही बात बार-बार कहती हैं, "पुलिस ने मेरे सामने ही मेरे बेटे को गोली मार दी, ऐसे तो किसी उग्रवादी को भी नहीं मारा जाता है. मेरा बेटा समाजसेवक था. पुलिस ने उसे क्यों मार डाला?"

घर के बरामदे पर बैठे भरत के बड़े भाई 35 वर्षीय वसंत तिवारी अपने छोटे भाई के साथ आँखों में आंसू भरे चुपचाप अपनी माँ और पिताजी को देख रहे हैं.

वसंत तिवारी अपने भाई को याद करते हैं कि भरत उनके चारों भाई-बहनों में सबसे प्रतिभाशाली थे. उन्होंने आरा कॉलेज से बीएससी तक पढ़ाई की थी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रहे थे.

उन्होंने बताया, "भरत ने समाज सेवा के लिए शादी न करने का फ़ैसला लिया था. शादी के लिए कोई मजबूर न करे, इसके लिए भरत ने करीब 10 साल पहले अपनी मर्ज़ी से ख़ुद का पिंडदान किया था और अंगदान का भी प्रण लिया था."

ग्रामीण विनय कुमार कहते हैं, "निडर, चंचल मन और सभी धाराओं में बहने वाला जवान ख़ून था. वो अति उत्साही ज़रूर था लेकिन बात सही बोलता था और काम समाज के लिए ही करता था."

वो राष्ट

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