एस्ट्रोनॉट कैसे बन सकते हैं और इसके लिए क्या पढ़ाई करनी होती है?
शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष जाने वाले दूसरे भारतीय हैं. हालांकि, वह कमर्शियल मिशन के तहत स्पेस गए थे. मगर भारत में एस्ट्रोनॉट बनने का रास्ता क्या है?
दो ऐसे नाम, जो सामने आते हैं तो आसमान दिखने लगता है. और उस आसमान को छूने की चाहत भी हक़ीक़त सी लगने लगती है.
साथ ही ये सवाल भी तैरने लगता है कि क्या हम भी अंतरिक्ष तक पहुंच सकते हैं?
अंतरिक्ष यात्री या एस्ट्रोनॉट किसी भी ह्यूमन स्पेस मिशन की सबसे अहम कड़ी होते हैं.
शुभांशु शुक्ला ने भारतीय वायुसेना की कॉकपिट से लेकर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) तक का सफ़र तय किया.
वहीं सुनीता विलियम्स की यात्रा एक नेवी पायलट के रूप में शुरू हुई थी, जो उन्हें नासा और फिर आईएसएस तक लेकर गई.
ज़ाहिर है, दिमाग़ में सवाल आ सकता है कि क्या अंतरिक्ष तक पहुंचने का रास्ता सिर्फ़ सेना से होकर ही जाता है?
क्या कोई आम इंसान भी एस्ट्रोनॉट बनने का सपना देखकर उसे पूरा कर सकता है?
करियर कनेक्ट में हम आज इन्हीं सवालों के जवाब तलाशेंगे कि भारत में एस्ट्रोनॉट कैसे बनते हैं, इसके लिए किस तरह की पढ़ाई की ज़रूरत होती है, कैसी तैयारी करनी होती है?
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
एस्ट्रोनॉट बनते कैसे हैं, उससे पहले ये जानना ज़रूरी है कि ये होते कौन हैं. तो अंतरिक्ष यात्री वे होते हैं, जिन्हें अंतरिक्ष में जाने, वहां काम करने और मिशन को सफल बनाने के लिए ख़ास तौर पर ट्रेन किया जाता है. ये स्पेसवॉक भी करते हैं. साथ ही साइंस, टेक्नोलॉजी और इंसानों के भविष्य से जुड़े बेहद अहम कामों को अंजाम देते हैं.
भारत की स्पेस एजेंसी इसरो यानी इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन ने स्पेस से जुड़ी शिक्षा और जानकारी को बढ़ावा देने के मक़सद से देश भर में 237 ट्यूटर चुने हैं. इनमें कई एनजीओ या प्राइवेट संस्थान शामिल हैं.
जो स्टूडेंट स्पेस साइंस और टेक्नोलॉजी के बारे में पढ़ना चाहते हैं, वे इन ट्यूटर के साथ रजिस्टर कर सकते हैं.
इनमें से एक निम्बस एजुकेशन के फ़ाउंडर और डायरेक्टर मनीष पुरोहित खुद भी इसरो के साथ साइंटिस्ट के तौर पर काम कर चुके हैं.
मनीष पुरोहित कहते हैं कि एस्ट्रोनॉट एक प्रोफेशन है, जैसे सॉफ़्टवेयर इंजीनियर होते हैं, डॉक्टर होते हैं. उन्होंने कहा, "एस्ट्रोनॉट शब्द अमेरिका, कनाडा, यूरोप और जापान के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. वहीं, सोवियत संघ और बाद में रूस के स्पेस ट्रैवलर कॉस्मोनॉट कहे जाते हैं. चीन के अंतरिक्ष यात्रियों को ताइकोनॉट कहा जाता है. भारत के अंतरिक्ष यात्री गगनयात्री कहे जाते हैं."
अब सवाल ये कि एस्ट्रोनॉट, कॉस्मोनॉट, ताइकोनॉट या फिर गगनयात्री. इनका काम क्या होता है.
एड्यूटेक कंपनी साइएस्ट्रा से जुड़ीं रिसर्च साइंटिस्ट यशिका पंडिता कहती हैं कि एस्ट्रोनॉट की ज़िम्मेदारियां अलग-अलग होती हैं.
वह कहती हैं, "कुछ के ज़िम्मे होता है एक्सपेरिमेंट, सैटेलाइट लॉन्च करना और स्पेसक्राफ़्ट-उपकरणों का रखरखाव, जबकि स्पेस शटल के कमांडर यानी इसे चलाने वाले पायलट एस्ट्रोनॉट होते हैं."
मनीष पुरोहित एस्ट्रोनॉट होने को एक फुल टाइम जॉब बताते हैं. उनका कहना है कि जब एस्ट्रोनॉट स्पेस में नहीं रहते, तब भी वो एस्ट्रोनॉट ही रहते हैं.
उन्होंने कहा,
📌 Kaynak
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