कोच्चि की इस जगह को छोड़कर यहां के यहूदी आख़िर कहां चले गए?
कोच्चि वह जगह है जो भारत में पहली यूरोपीय कॉलोनी बनी. ज्यू टाइन वह जगह है जहां 500 साल पहले वास्को डा गामा आए थे. उन्होंने यहीं अंतिम सांस ली और यहीं दफ़न हुए.
केरल के तटीय शहर कोच्चि (कोचीन) में मट्टानचेरी नाम की एक बस्ती आबाद है जो 'ज्यू टाउन' यानी यहूदियों की बस्ती कहलाती है.
यह वह इलाक़ा है जहां पूरे 500 साल पहले मशहूर पुर्तगाली नाविक और खोजी वास्को डा गामा आए और कोच्चि वह जगह है जो भारत में पहली यूरोपीय कॉलोनी बनी. उन्होंने यहीं अंतिम सांस ली और यहीं दफ़न हुए.
ऐतिहासिक रूप से वास्को डा गामा के आने के बाद पुर्तगालियों ने यहूदियों को निशाना बनाया तो कोचीन के राजा ने उन्हें अपने महल से सटी हुई ज़मीन दान की और एक ताम्र पत्र दिया जिस पर लिखा था, "जब तक सूरज और चांद आसमान पर चमकते रहेंगे, तब तक यह ज़मीन यहूदियों की रहेगी."
आज इस जगह पर उनकी यादें तो हैं लेकिन एक यहूदी कीथ हेलोगुआ के अलावा सभी यहूदी इस जगह को छोड़कर चले गए हैं.
यहां यह जानना ज़रूरी है कि अब इस इलाक़े में ज़्यादातर मुसलमानों की दुकानें हैं जिनमें कश्मीरियों की दुकानें ज़्यादा नज़र आती हैं.
इससे पहले कि हम ज्यू टाउन की सैर करें, यह जानना दिलचस्प होगा कि आख़िर हिंदुस्तान में पहली बार यहूदी कब आए?
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
इस क्षेत्र में यहूदियों का पहला क़ाफ़िला लगभग एक हज़ार साल ईसा पूर्व पैग़ंबर सुलेमान के दौर में समुद्र के रास्ते दक्षिण भारत के तटों पर उतरा था.
उस वक़्त कोच्चि के तट के बजाय वहां से लगभग 40 किलोमीटर उत्तर में मुज़िरिस (यूनानी नाम) यानी क्रंगानूर (अब कोडुंगलूर) की बंदरगाह थी.
ये लोग व्यापारिक सामान के साथ आए और इस क्षेत्र में इस तरह रच-बस गए कि यहीं के होकर रह गए, बाद में वे मालाबारी यहूदी कहलाए.
कोचीन में यहूदी इबादतगाह (परदेसी सिनेगॉग) के रिकॉर्ड के अनुसार यहूदियों का दूसरा बड़ा प्रवास और भारत आगमन 1492 में स्पेनिश अत्याचारों से भागने वाले सेफ़ार्दी यहूदियों का था.
पुर्तगाल, तुर्की और बग़दाद के रास्ते यात्रा करते हुए वे केरल पहुंचे और कोच्चि में आबाद हुए और विदेशी यहूदियों के नाम से जाने गए.
मालाबारी और विदेशी यहूदी मिलकर 'कोचीनी यहूदी' कहलाए. वह कोच्चि में बस गए, जो पहले अरबों, फिर पुर्तगाली, ब्रिटिश और डच लोगों के लिए व्यापारिक केंद्र बना.
यहूदियों को कोच्चि के राजा ने सुरक्षा मुहैया कराई और वह उस वक़्त से बीसवीं सदी में यहां से वापस जाने तक सुख-शांति से यहां आबाद रहे.
कोच्चि हेरिटेज प्रोजेक्ट चलाने वाले कोच्चि के निवासी योहान बिन्नी कुरुविला इस सफ़र में हमारे साथ थे.
हमने इस उम्मीद पर वहां की यात्रा अप्रैल की शुरुआत में की ताकि शायद वहां मौजूद सिनेगॉग में कुछ यहूदियों से मुलाक़ात हो जाए क्योंकि यह समय उनके धार्मिक उत्सव 'पासओवर' का होता है.
यह त्योहार यहूदियों की पवित्र पुस्तक के अनुसार, मिस्र के फ़िरऔन (फ़राओ) से मुक्ति की ख़ुशी में मनाया जाता है, लेकिन इस अवसर पर सिनेगॉग और म्यूज़ियम छुट्टी के कारण बंद थे.
हमारी मुलाक़ात वहां के विज़िटिंग रब्बी (यहूदियों के विद्वान और धर्मगुरु) जोनाथन श्मिट गोल्डस्मिथ से हुई जो इस अवसर पर वहां मौजूद थे.
उन्होंने न केवल हमारी मेज़बानी की बल्कि ज्
📌 Kaynak
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