'पहले लगता था काश मेरा भी बच्चा होता': नसबंदी करवा चुके पूर्व नक्सली कैसे बन रहे हैं मां-बाप

📌 Diğer 📰 BBC Hindi 🕐 2 gün önce
'पहले लगता था काश मेरा भी बच्चा होता': नसबंदी करवा चुके पूर्व नक्सली कैसे बन रहे हैं मां-बाप

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में अब तक तक़रीबन 50 आत्म समर्पित नक्सलवादियों की नसबंदी फिर से खोलने की सर्जरी हुई है. इनमें से 14 को संतान भी हुई है.

"दूसरों के बच्चे को देखकर लगता था कि अगर मेरा बच्चा होता तो उसे घुमाती, उस पर बहुत प्यार बरसाती, उसको ख़ूब लाड़ करती."

अपने आँगन में पेड़ के नीचे बैठीं मंदा दोरपेड्डी बता रही थीं कि माँ बनने की उनकी इच्छा कितनी तीव्र थी.

मंदा आत्मसमर्पित नक्सलवादी हैं और इस समय गढ़चिरौली की एक बस्ती में रहती हैं. उन्होंने चार कमरों का पक्का घर बनाया है और घर के पास की नर्सरी में मज़दूरी करके अपना गुज़ारा करती हैं.

सरेंडर के बाद उन्हें लगता था कि अब पति-पत्नी के रूप में जीने से आगे बढ़कर बच्चों वाला परिवार होना चाहिए. लेकिन मन में यह भी आता था कि शायद यह संभव नहीं होगा, क्योंकि उनके पति की नसबंदी नक्सल आंदोलन में रहते हुए हो चुकी थी.

लेकिन अब मंदा की माँ बनने की इच्छा पूरी हो गई है. उनकी दो बेटियाँ हैं और उनका हँसता-खेलता परिवार है. यह संभव हुआ गढ़चिरौली पुलिस के प्रोजेक्ट संजीवनी के तहत कृष्णा की नसबंदी को फिर से खोलने (रीओपन) की वजह से.

मंदा कहती हैं, "जब मैं गर्भवती हुई थी तो लगता था कि अब हमारा भी बच्चा आएगा. हमें बच्चा होगा. हम उसे ख़ूब खिलाएंगे. मैं दिल से एकदम ख़ुश हो गई थी."

उनके पति कृष्णा दोरपेड्डी कहते हैं कि बेटियां पैदा होने के बाद से उनकी ज़िंदगी में कई बदलाव आए हैं.

वह कहते हैं, "नसबंदी हटने के बाद पहली बेटी हुई. मैं बाहर से घर आता हूँ तो 'पापा आए, पापा आए' कहते हुए दौड़कर बाहर आती है. देखती है कि मैं क्या खाने को लाया हूँ. यह हमारे लिए बहुत बड़ी ख़ुशी की बात है."

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पिता बनने के बाद कृष्णा बेहद ख़ुश हैं. लेकिन यह ख़ुशी पहले उनकी ज़िंदगी में नहीं थी. वह 2003 में नक्सल आंदोलन में शामिल हुए थे. गाँव में नक्सली आते, 'नाच-गाना' करते, उनका पहनावा और हाथ में बंदूक़ देखकर वह आंदोलन में चले गए थे.

2006 में उनका विवाह होना था. उसी समय उनकी नसबंदी की सर्जरी कर दी गई. इसके बाद उन्होंने 2014 तक यानी 11 साल नक्सल आंदोलन में काम किया.

लेकिन पुलिस की गश्त बढ़ गई थी. जंगल में रहना मुश्किल हो गया था इसलिए उन्होंने पत्नी के साथ छिपकर गढ़चिरौली पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

कृष्णा बताते हैं कि 2009 से पुलिस बल बढ़ गया था. कहीं पानी नहीं मिलता था. कभी खाना बनाकर खाने को भी नहीं मिलता था. जहाँ भी जाते, पुलिस पहुँच जाती. लगा कि अब यहीं रहकर मरना पड़ेगा. इसलिए एक रात छिपकर निकले और पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया.

आत्मसमर्पण करते समय ही उन्होंने पूछताछ में पिता बनने की इच्छा ज़ाहिर की थी.

कृष्णा कहते हैं, "जंगल में तो बच्चों को रख ही नहीं सकते थे. लेकिन यहाँ आने के बाद मन में आया कि क्या नसबंदी खोल सकते हैं? पूछताछ के दौरान बताया कि मेरी नसबंदी हो चुकी है. अगर खोलनी हो तो क्या संभव है? मैं तैयार हूँ."

इसके बाद एक ही साल में उनकी नसबंदी की सर्जरी करके उसे फिर से खोला गया और वह सफल भी रही. 2016 में कृष्णा और मंदा की पहली बेटी हुई. अब उनकी दूसरी बेटी भी तीन साल की है.

कृष्णा और मंदा पढ़-लिख नहीं पाए. लेकिन

📌 Kaynak

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