जेईई की गर्ल्स टॉपर की कहानी, तैयारी के लिए जब पूरे परिवार ने शहर ही बदल दिया

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जेईई की गर्ल्स टॉपर की कहानी, तैयारी के लिए जब पूरे परिवार ने शहर ही बदल दिया

आरोही ने 360 में से 280 अंक पाकर कुल रैंकिंग में 77वाँ स्थान पाया है. उनका शानदार प्रदर्शन सिर्फ़ एडवांस्ड तक सीमित नहीं रहा. जेईई मेन्स में उन्होंने 99.996 पर्सेंटाइल स्कोर किया था.

बीते 15 दिनों से ही आरोही देशपांडे के दिन देर से शुरू हो रहे हैं. उठने के बाद वह या तो लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स त्रयी (ट्राइलॉजी) पढ़ती हैं या फ़िल्में देखती हैं.

लगभग चार साल बाद उनकी ज़िंदगी में यह सुकून लौटा है. लेकिन सोमवार, 1 जून से यह शांति भी चली गई है. वजह है रिश्तेदारों और परिचितों के लगातार बधाई वाले फ़ोन.

इस साल आरोही देशपांडे ने जेईई एडवांस्ड में देशभर की लड़कियों में पहला स्थान हासिल किया है. उन्होंने 360 में से 280 अंक पाकर कुल रैंकिंग में 77वाँ स्थान पाया.

उनका शानदार प्रदर्शन सिर्फ़ एडवांस्ड तक सीमित नहीं रहा. जेईई मेन्स में उन्होंने 99.996 पर्सेंटाइल स्कोर किया. उन्होंने 12वीं में 97.8% और 10वीं में 96.7% अंक हासिल किए थे.

आरोही की यह यात्रा नौवीं कक्षा से शुरू हुई. पुणे के लोकसेवा ई-स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने तय किया कि उन्हें इंजीनियरिंग में करियर बनाना है. इस फ़ैसले पर उनके परिवार में मौजूद इंजीनियरों की बड़ी संख्या का असर था.

आरोही बताती हैं, "मुझे गणित अच्छा लगता था. इसके अलावा मेरे परिवार में कई इंजीनियर हैं. उन्हें देखकर मुझे लगा कि मुझे भी इंजीनियरिंग करनी चाहिए. इसके बाद मैंने तैयारी शुरू कर दी. उससे पहले तक मैंने अपने लिए कोई ख़ास, ठोस लक्ष्य तय नहीं किया था."

इसके बाद पूरा परिवार उनके इस लक्ष्य को पूरा करने में जुट गया. पहला क़दम था पुणे छोड़ने का.

बीबीसी मराठी से बातचीत में उनके पिता प्रसाद देशपांडे ने कहा, "कोविड-19 महामारी के दौरान वह सातवीं और आठवीं में पढ़ रही थी. उस समय हमें कुछ ऑनलाइन लेक्चर मिले. इन्हें देखते हुए हमें पता चला कि ज़्यादातर प्रोफ़ेसर कोटा से हैं. इसलिए हमने कोटा और वहाँ की अकादमियों के बारे में जानकारी जुटाना शुरू किया."

इसके बाद पूरे परिवार ने कोटा शिफ़्ट होने का फ़ैसला किया. आरोही के पिता आईटी सेक्टर में काम करते हैं, जबकि उनकी माँ सिविल और एनवायरनमेंटल इंजीनियर हैं.

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कोविड के बाद दोनों ने 'वर्क फ्रॉम होम' का विकल्प चुना. पूरा परिवार- आरोही, उनका छोटा भाई और माता-पिता कोटा में बस गए. वहां आरोही की पढ़ाई शुरू हो गई.

उन्होंने यह भी इंतज़ाम किया कि जब माता‑पिता को हर महीने अपनी कंपनियों में जाना पड़े, तो उसके लिए पहले से व्यवस्था हो.

चूंकि शहर में उनके कोई परिचित नहीं थे, इसलिए कोटा में उनके चार साल लगभग पूरी तरह परिवार तक ही सीमित रहे, सामाजिक मेल-जोल लगभग नहीं रहा. पिता की अपनी कंपनी की हैदराबाद और माँ की गुरुग्राम यात्रा भी आरोही के शेड्यूल को ध्यान में रखकर तय की जाती थी.

हालांकि पुणे छोड़ने का फ़ैसला दोनों के लिए आसान नहीं था. आरोही बताती हैं, "मेरी नानी पुणे में रहती थीं. मेरे दोस्त भी वहीं थे. मुझे बुरा लगा क्योंकि मुझे सबको पीछे छोड़ना पड़ा. कोटा आने के बाद भी मैं उन्हें याद करती थी. लेकिन आख़िरकार मैंने पढ़ाई पर ध्यान देने का फ़ैसला किया."

कोटा में उन्होंने क्लासेस जॉइन कीं और बोर्ड परीक्षाओं की पढ़ाई शुरू की. लेकिन असली ध्यान

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