उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा रहस्यः किम जोंग उन कभी अपनी मां के बारे में बात क्यों नहीं करते

📌 Diğer 📰 BBC Hindi 🕐 3 gün önce
उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा रहस्यः किम जोंग उन कभी अपनी मां के बारे में बात क्यों नहीं करते

बहुत कम उत्तर कोरियाई लोग उनके बारे में जानते हैं, क्योंकि उनकी पृष्ठभूमि शासन की वैधता के लिए खतरा बन सकती है.

उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन से जुड़ी तमाम रहस्यमयी बातों में उनकी माँ को लेकर बरती गई गोपनीयता सबसे अलग है. सत्ता में 15 साल पूरे होने के बाद भी किम ने कभी सार्वजनिक रूप से अपनी माँ का नाम नहीं लिया.

उत्तर कोरिया की वंशानुगत तानाशाही की वैधता 'माउंट पैकतु' वंश पर टिकी है - यह कोरियाई प्रायद्वीप का सबसे ऊँचा पर्वत है, जिसे कोरियाई लोगों का पौराणिक जन्मस्थान माना जाता है. यही वह जगह भी है जहां देश के संस्थापक किम इल सुंग ने जापानी उपनिवेशवादियों के ख़िलाफ़ गुरिल्ला गतिविधियां चलाई थीं.

देश के संस्थापक किम इल सुंग की माँ कांग पान सोक और किम जोंग इल की माँ किम जोंग सुक - को 'कोरिया की माँएं' कहकर सम्मानित किया गया.

लेकिन किम जोंग उन की मां को योंग हुई एक अनजानी शख़्सियत हैं, जिनके नाम पर कुछ भी नहीं रखा गया है.

को योंग हुई को लेकर यह चुप्पी शायद उनके सामाजिक वर्ग को 'दाग़दार' मानने और उन्हें उपपत्नी समझे जाने से जुड़ी है. विश्लेषकों का कहना है कि यह तथ्य शासन के लिए ख़तरा बन सकते हैं.

जीवनीकारों के मुताबिक़, को का जन्म 1952 में जापान के ओसाका में हुआ था. उनके माता-पिता मूल रूप से आधुनिक दक्षिण कोरिया के जेजू द्वीप से थे- यानी दुश्मन इलाक़े से.

जापान में रहने वाले को का परिवार 'ज़ाइनिची कोरियाई' कहलाता था - वे लोग जो 1910 से 1945 तक जापान के औपनिवेशिक शासन के दौरान वहां आकर बसे थे.

उत्तर कोरिया लौटने वाले इन परिवारों को शुरू में ईर्ष्या की नज़र से देखा गया क्योंकि वे पूँजीवादी पड़ोसी देश से नक़द, कपड़े और घरेलू सामान लेकर आते थे. लेकिन उन्हें 'ज्जैपो' कहकर भी पुकारा गया. यह उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक अपमानजनक शब्द था, जिन्हें विदेशी और ख़तरनाक विचारधाराओं से दूषित माना जाता था.

उत्तर कोरिया में एक सख़्त सामाजिक वर्गीकरण प्रणाली है, जिसे 'सोंगबुन' कहा जाता है.

इसमें ज़ाइनिची कोरियाई 'अस्थिर वर्ग' में आते हैं, जो मुख्य वर्ग और शत्रु वर्ग के बीच होता है. इन पर राज्य की कड़ी निगरानी रहती है और अक्सर इन्हें अच्छे विश्वविद्यालयों या बेहतर नौकरियों में प्रवेश नहीं मिलता.

उत्तर कोरिया एक बहुत गहरे तक वर्गीकृत समाज है, जिसे कुछ विश्लेषक जाति व्यवस्था जैसी प्रणाली बताते हैं.

डोंगयांग विश्वविद्यालय के डॉक्टर जियोंग यंग-ताए कहते हैं कि यह 'संबंध से दोषारोपण की व्यवस्था' भी है, जहाँ नागरिकों को उनके परिवार के सदस्यों के कामों की सज़ा भुगतनी पड़ती है.

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

जब को करीब 10 साल की थीं तब उनका परिवार उत्तर कोरिया चला गया था. उनका परिवार उन अनुमानित 93,000 कोरियाई लोगों में शामिल था जो 1959 से 1984 के बीच जापान से कम्युनिस्ट देश उत्तर कोरिया पहुंचे थे.

वे लोग 'पृथ्वी पर स्वर्ग' अभियान के तहत उत्तर कोरिया पहुंचे थे. यह एक ऐसी योजना थी जिसमें लौटने वालों के लिए मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और नौकरियों के साथ आदर्श जीवन का वादा किया गया था.

लेकिन को ने अपने साथी ज़ाइनिची कोरियाई लोगों की त

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